राजनीतिक लोगों की इतनी सक्रियता इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली। अचानक उत्तराखंड के बड़े राजनीतिक दल लोहारीनाग-पाला जलविद्युत परियोजना के समर्थन में खड़े हो गए हैं। वैसे तो यह परियोजना एनटीपीसी ने बनानी है और उत्तराखंड को इससे मात्र ७२ मेगावाट बिजली ही मिलनी है, लेकिन सभी दल इसके बड़े पैरोकार बनकर सामने आए हैं। राज्य को बिजली का बड़ा नुकसान बताया जा रहा है। जबकि उत्तराखंड की अपनी परियोजनाओं के बंद होने पर कोई शोर नहीं मचा। सभी दल मौन साधे रहे। पाला-मनेरी व भैरोंघाटी से उत्तराखंड को ८७१ मेगावाट बिजली मिलनी थी। अब समाचार पत्रों में रोज नेताओं के बयान आ रहे हैं। सभी लोहारीनाग-पाला परियोजना शुरू कराने की मांग कर रहे हैं। कोई प्रधानमंत्री को पत्र लिख रहा है तो कोई मुख्यमंत्री को। लेकिन सबसे बड़े सवाल पर सभी मौन साधे हैं कि राज्य की परियोजनाओं के समय आप कहां मौन साधे बैठे थे।
सभी परियोजनाओं की स्थिति एक जैसी है। केंद्रीय मंत्रीसमूह ने तीनों परियोजनाओं को रद्द करने की सिफारिश की है। अंतिम फैसला गंगा विकास प्राधिकरण को करना है। तब भी राज्य के नेताओं ने लोहारीनाग-पाला परियोजना शुरू कराने को पूरा जोर लगा रखा है। जानकारों का कहना है कि इस मांग के पीछे परियोजना में जुड़े हुए ठेकेदार हैं। जो कहीं न कहीं से राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं। परियोजना बंद होने पर उन्हें बड़ा नुकसान होने की संभावना है। अफने नुकसान को रोकने के लिए वह दवाब बना रहे हैं और नेता मांग उठा रहे हैं।
स्थानीय दल उत्तराखंड क्रांति दल तो बकायदा इसके लिए भूख हड़ताल शुरू कर चुका है। न तो परियोजना के समर्थन में राज्य में कोई लहर है और स्थानीय स्तर पर बड़ा विरोध हो रहा है। ऎसे में उक्रांद के लिए सबसे बड़ा विषय लोहारीनाग-पाला हो गया। शेष विषय अब उसे नहीं दिखाई देते। जमीन धंसने के बाद भटवाड़ी के लोगों के लिए आजीविका का एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। लोगों को रहने की दिक्कत है। घोषणा होने के बाद मुआवजा राशि नहीं बंटी, लोग भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उक्रांद को यह नहीं दिखाई देता।
मुख्यमंत्री निशंक ने ३ अगस्त को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने लोहारीनाग-पाला परियोजना को बंद करने की सिफारिश की थी। उन्होंने इसमें पर्यावरण को होने वाले नुकसान का हवाल दिया था। अब उनके खासमखास दायित्वधारी परियोजना के समर्थन में खड़े हो गए हैं। क्या आपकों नहीं लगता कि यह सब मिलीजुली रणनीति है। क्या दायित्वधारियों में इतना साहस है कि वह मुख्यमंत्री के विरोध में दो शब्द भी कह सकें। दूसरी ओर कांग्रेस पर्यावरण के बिंदू को पूरी तरह नजरंदाज कर सिर्फ परियोजना शुरू कराना चाहता है।
पांडुकेश्वर में अंतिम संस्कार करने के लिए भी स्थानीय लोगों को जेपी परियोजना का मुंह ताकना पड़ता है। परियोजना से पानी छोड़ने के बाद अंतिम संस्कार हो पाता है। नदी में इकानामिक फ्लो को लेकर कोई बात करने को तैयार नहीं। उन्हें सिर्फ परियोजना चाहिए। जिससे उनका काम चलता रहै। जनता जाए भाड़ में। इस सबके बीच आम आदमी बेहद निरीह होकर सब कुछ देख रहा है। उसकी किसी को परवाह नहीं है। पर्यावरण, सभ्यता, जीवन आदि से जुड़े तमाम ऎसे सवाल हैं, जिन्हें राजनीति से ऊपर उठकर सोचना पड़ेगा।
Friday, September 3, 2010
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