Sunday, November 16, 2008

पहाड़




पहाड़
आदमी स‌े पहले
पेड़ का घर है
पहाड़ों पर हवाएं पसरती हैं
पहाड़ों पर रहती हैं नदियां
कूदती-फांदती हुई
पहाड़
बर्फ, कोहरे और
बादलों के लिए होता है
बर्फ, बादल, कोहरा, पेड़, पानी
और हवाएं
होते हैं हमारे लिए
तुम्हारे लिए
चिड़ियों और मछलियों के लिए
कुछ इस तरह
स‌ारी दुनिया के लिए होते हैं
पहाड़।
(साभारः रचना- श्री लोकेश नवानी, फोटो- श्री डीएस स‌िजवाली)

Sunday, November 2, 2008

पहाड़वाला में आपका स्वागत है...

पहाड़वाला एक मंच है, पहाड़ से सम्बंधित उन तमाम विषयों पर चर्चा करने का, जो भागती जिंदगी में कहीं छूट से गए हैं। यहाँ न सिर्फ़ पहाड़ की खूबसूरती और विशेषताओं की बातें होंगी, बल्कि उसकी विषमता और विवशता को भी सामने रखा जाएगा। तो उठाइए अपने मुद्दे, रखिये अपनी बात। दूसरे के विचारों को दें मजबूती या खारिज करिए आधारहीन तथ्यों को। इंतजार नहीं, आज से ही करें शुरुआत.....

आप भी चुप, हम भी मौन... मर रहा है देवदार

कुछ दिनों पहले ही लोहाघाट स‌े वापस देहरादून लौटा हूं। कभी लोहाघाट की शान स‌मझे जाने वाले देवदारों की हालत देखकर इस बार काफी दुख हुआ। देवदारों का जंगल, जिसे कुमाऊंनी में देरयानी कहते हैं, अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। वैसे तो लोहाघाट में देवदार अलग-अलग हिस्सों में बिखरा हुआ है लेकिन कुछ इलाके तो गजब के खूबसूरत है। जिन जंगलों के दूसरे तरफ का दृश्य कभी दिखाई नहीं देता था, अब उसमें स‌े स‌ब कुछ स‌ाफ दिखता है। देवदारों का न स‌िर्फ घनत्व कम हुआ है बल्कि जो पेड़ खड़े दिखाई भी देते हैं वे भी लगभग नंगे बना दिए गए हैं। ये बात शहर के बीचों बीच स्थित छोटे-छोटे हिस्सों की हो रही है। दूरदराज में तो माफियाओं ने क्या हाल बना दिया है, कुछ पता ही नहीं। वन विभाग की एक बड़ी फौज यहां मौजूद है। उपजिलाधिकारी के कार्यालय के पास एक हिस्से में कुछ स‌मय तक आठ-दस देवदार के पेड़ दिखाई देते थे। कीलें चुभा-चुभा कर, खाल नोच-नोच कर पहले इन्हें स‌ुखाया गया और अब तो इनका नामोनिशां तक नहीं है। यही हाल मीना बाजार के पीछे के जंगल का है और कुछ ऎसा ही ट्रेजरी के नीचे स्थित जंगल का। राजकीय इंटर कालेज के पीछे के जंगल में जाने में भी अब लोग डरते नहीं क्योंकि आर-पास स‌ब दिखता है।

देवदारों की इन हालत पर स‌रकारी तंत्र का नाकारापन तो दिखाई ही देता है, हैरत इस बात पर है कि यहां का आम आदमी भी मौन है। कहीं स‌े कोई आवाज तक नहीं आती। वर्ल्ड बैंक स‌े पैसा लेने के लिए भले ही स‌ैकड़ों की स‌ंख्या में एनजीओ बन गए हों लेकिन इस ओर किसी का कोई ध्यान नहीं है। बाहर की खूबसूरती देखने के लिए घर स‌े निकलने वाले युवाओं की स‌ंख्या तो बढ़ी है पर अपने घर की स‌ुंदरता की हिफाजत करना शायद स‌ब भूल गए हैं। यहां जिक्र बेशक लोहाघाट का हो रहा है पर यह स‌मस्या स‌िर्फ लोहाघाट नहीं बल्कि पूरे पहाड़ की है। जंगल कट रहे हैं, और लोग खुश। स‌वाल है कब तक। कहीं चिपको की तरह किसी और आंदोलन की तो जरूरत नहीं। बाद में कहीं देर न हो जाए। किस तरह काम किया जा स‌कता है, कैसे हम लोग एक स‌ाथ आ स‌कें, स‌रकारी तंत्र भी अपनी जिम्मेदारी को स‌मझे, इन तमाम स‌वालों पर चिंतन-मनन और फिर निश्चित रूप स‌े काम करने की जरूरत है। तो करें कुछ शुरुआत.....