Friday, September 3, 2010

परियोजनाएं और राजनीति का स‌च

राजनीतिक लोगों की इतनी स‌क्रियता इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली। अचानक उत्तराखंड के बड़े राजनीतिक दल लोहारीनाग-पाला जलविद्युत परियोजना के स‌मर्थन में खड़े हो गए हैं। वैसे तो यह परियोजना एनटीपीसी ने बनानी है और उत्तराखंड को इससे मात्र ७२ मेगावाट बिजली ही मिलनी है, लेकिन स‌भी दल इसके बड़े पैरोकार बनकर स‌ामने आए हैं। राज्य को बिजली का बड़ा नुकसान बताया जा रहा है। जबकि उत्तराखंड की अपनी परियोजनाओं के बंद होने पर कोई शोर नहीं मचा। स‌भी दल मौन स‌ाधे रहे। पाला-मनेरी व भैरोंघाटी स‌े उत्तराखंड को ८७१ मेगावाट बिजली मिलनी थी। अब स‌माचार पत्रों में रोज नेताओं के बयान आ रहे हैं। स‌भी लोहारीनाग-पाला परियोजना शुरू कराने की मांग कर रहे हैं। कोई प्रधानमंत्री को पत्र लिख रहा है तो कोई मुख्यमंत्री को। लेकिन स‌बसे बड़े स‌वाल पर स‌भी मौन स‌ाधे हैं कि राज्य की परियोजनाओं के स‌मय आप कहां मौन स‌ाधे बैठे थे।
स‌भी परियोजनाओं की स्थिति एक जैसी है। केंद्रीय मंत्रीसमूह ने तीनों परियोजनाओं को रद्द करने की स‌िफारिश की है। अंतिम फैसला गंगा विकास प्राधिकरण को करना है। तब भी राज्य के नेताओं ने लोहारीनाग-पाला परियोजना शुरू कराने को पूरा जोर लगा रखा है। जानकारों का कहना है कि इस मांग के पीछे परियोजना में जुड़े हुए ठेकेदार हैं। जो कहीं न कहीं स‌े राजनीतिक दलों स‌े जुड़े हुए हैं। परियोजना बंद होने पर उन्हें बड़ा नुकसान होने की स‌ंभावना है। अफने नुकसान को रोकने के लिए वह दवाब बना रहे हैं और नेता मांग उठा रहे हैं।
स्थानीय दल उत्तराखंड क्रांति दल तो बकायदा इसके लिए भूख हड़ताल शुरू कर चुका है। न तो परियोजना के स‌मर्थन में राज्य में कोई लहर है और स्थानीय स्तर पर बड़ा विरोध हो रहा है। ऎसे में उक्रांद के लिए स‌बसे बड़ा विषय लोहारीनाग-पाला हो गया। शेष विषय अब उसे नहीं दिखाई देते। जमीन धंसने के बाद भटवाड़ी के लोगों के लिए आजीविका का एक बड़ा स‌वाल खड़ा हो गया है। लोगों को रहने की दिक्कत है। घोषणा होने के बाद मुआवजा राशि नहीं बंटी, लोग भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उक्रांद को यह नहीं दिखाई देता।
मुख्यमंत्री निशंक ने ३ अगस्त को प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने लोहारीनाग-पाला परियोजना को बंद करने की स‌िफारिश की थी। उन्होंने इसमें पर्यावरण को होने वाले नुकसान का हवाल दिया था। अब उनके खासमखास दायित्वधारी परियोजना के स‌मर्थन में खड़े हो गए हैं। क्या आपकों नहीं लगता कि यह स‌ब मिलीजुली रणनीति है। क्या दायित्वधारियों में इतना स‌ाहस है कि वह मुख्यमंत्री के विरोध में दो शब्द भी कह स‌कें। दूसरी ओर कांग्रेस पर्यावरण के बिंदू को पूरी तरह नजरंदाज कर स‌िर्फ परियोजना शुरू कराना चाहता है।
पांडुकेश्वर में अंतिम स‌ंस्कार करने के लिए भी स्थानीय लोगों को जेपी परियोजना का मुंह ताकना पड़ता है। परियोजना स‌े पानी छोड़ने के बाद अंतिम स‌ंस्कार हो पाता है। नदी में इकानामिक फ्लो को लेकर कोई बात करने को तैयार नहीं। उन्हें स‌िर्फ परियोजना चाहिए। जिससे उनका काम चलता रहै। जनता जाए भाड़ में। इस स‌बके बीच आम आदमी बेहद निरीह होकर स‌ब कुछ देख रहा है। उसकी किसी को परवाह नहीं है। पर्यावरण, सभ्यता, जीवन आदि स‌े जुड़े तमाम ऎसे स‌वाल हैं, जिन्हें राजनीति स‌े ऊपर उठकर स‌ोचना पड़ेगा।

Tuesday, August 31, 2010

आओ फिर शुरू करे पहाड़ की यात्रा

सबसे पहले देरी के लिए माफ़ी
डेढ़ साल के समय को लम्बा कहू या छोटा समझ में नहीं आता। अपने इस ब्लॉग पर लम्बे समय से कुछ लिख नहीं सका था। एक बार फिर शुरुआत कर रहा हु। इस बीच पहाड़ के सामने कई मुद्दे आये, विकास के भी, संस्कृति के भी, धर्म के भी और मानव समाज के भी। पहाडवाला के माध्यम से इन्हें सही रूप और रंग में समझने की कोशिश रहेगी। आप सभी लोगो का एक बार फिर स्वागत। उम्मीद है आप अपनी प्रतिक्रियाये देकर पहाड़ को और बेहतर बनाने में अपना सहयोग देंगे।

Tuesday, January 6, 2009

आसमान स‌े उड़ते रुई के फाहे

बर्फ गिरते हुए देखने में एक अजीब स‌ा सुकून महसूस होता है। उसे शब्दों में व्यक्त करना तो थोड़ा मुश्किल है लेकिन भावनाओं को स‌मझा जा स‌कता है। बर्फ गिरते स‌मय आमतौर स‌े मौसम एकदम शांत होता है। न हवा चलती है और न किसी तरह का शोर। रुई के फाहों की तरह आसमान स‌े उड़ते हुए आती बर्फ को देखना वाकई में काफी आनंददायक है। गिरती बर्फ को लगातार एक ही जगह पर देखने पर लगता है कि हम ऊपर की तरफ जा रहे हैं और पूरा माहौल स्थिर है। पिछले कुछ दिनों स‌े पहाड़ में बर्फ पड़ने का मौसम बन रहा है। ऊंची पहाड़ियों में तो कई जगह बर्फ गिर भी गई है। आप लोगों के लिए भी यह एक मौका है, जब आप कुदरत के उस तोहफे का आनंद उठा स‌कते हैं, जिसे स‌िर्फ देखभर लेना ही पर्याप्त है।
मुझे याद है वो जाड़ों के दिन, जब हम अक्सर बर्फ पड़ने का इंतजार करते थे। जाड़ों के दिनों लंबे स‌मय तक मौसम खराब रहने पर अक्सर लोग कहते थे कि अब बर्फ पड़ जाए तो मौमस स‌ाफ हो जाएगा। और ऎसा होता भी था। बाहर बर्फ पड़ रही हो और आप अंदर खिड़की स‌े बाहर देख रहे हों। स‌ोचकर ही अच्छा लगता है। ऎसे मौस‌म में अक्सर ईजा (कुमाऊंनी में मां) भट्ट (सोयाबीन) भूनती थी। गुड़ के स‌ाथ भुने हुए भट्ट बहुत ही स्वादिष्ट लगते थे, आज भी उनका स्वाद और खुशबू महसूस होती है। जैसे ही बर्फ गिरती थी तो फिर बाहर निकलना। बर्फ के गोले बनाकर एकदूसरे पर मारना, लकड़ी के पट्टों स‌े स्कीइंग करना, बर्फ के मानवाकार पुतले बनाना अद्भुत आनंद देते थे।

और हां बर्फ में दन (कालीन) की स‌फाई भी हो जाती है। बर्फ के ऊपर उल्टा डालकर हम लोग दन को लकड़ियों स‌े पीटते थे। उसकी स‌ारी गंदगी बर्फ स‌ाफ कर देती थी और दन गीला भी नहीं होता था। बर्फ न स‌िर्फ मन प्रसन्न करती है, बल्कि खेती के लिए भी काफी फायदेमंद है। बारिश में तो काफी पानी बह जाता है लेकिन बर्फ पड़ने पर जमीन धीमे-धीमे पानी स‌ोखती है। और भी कई अनुभव बर्फ स‌े जुड़े हुए हैं। जिन्हें मैं चाहता हूं कि आप खुद आकर महसूस करें। जैसे कि रात में चमकती बर्फ को देखना या बर्फ में दूध की कटोरी रखकर उसे जमते हुए देखना।... तो इंतजार कैसा, उत्तराखंड आपका स्वागत कर रहा है।

Monday, January 5, 2009

यहां पानी पर उतरता है हिमालय

लोगों की जुबान पर बेशक 'तालों में नैनीताल, बाकी स‌ब तलैया' चढ़ा हुआ हो लेकिन उत्तराखंड ‌स्थित अन्य बेहद खुबसूरत ताल हमेशा स‌े पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। प्रकृति को बेहद करीब और उसकी ही नजर स‌े देखने का जो अनुभव इन तालों में महसूस किया जा स‌कता है, वैसा कहीं और नहीं। तालों के पानी में बनने वाली हिमालय की छवि देखकर कोई भी मुग्ध हुए बिना नहीं रह स‌कता। ये ताल आपको स‌ौंदर्य के आगोश में लेने के लिए तैयार बैठे हैं, तो लीजिए स‌ाहस‌िक पर्यटन का आनंद और कीजिए प्रकृति स‌े साक्षात्कार । रूपकुंड स‌दियों स‌े लोगों के लिए रहस्य बना रहा, और अब भी है। आम श्रद्धालुओं व पर्यटकों स‌े लेकर देश-विदेश के वैज्ञानिक हमेशा यहां आना चाहते हैं। रूपकुंड के आसपास कई स‌ालों स‌े बिखरे हुए मानव अस्थि कंकाल अब भी उसी तरह स‌ुरक्षित हैं। इनके विषय में फैली भ्रांतियों की वजह स‌े यह कुंड रहस्यमयी झील के नास‌े भी जाना जाता है। चमोली जिले के पूर्वी भाग में ‌स्थित रूपकुंड स‌मुद्रतल स‌े 5029 मीटर की ऊंचाई पर है। नंदा देवी राजजात यात्रा का मार्ग रूपकुंड होते हुए ही गुजरता है। लगभग प्रत्येक 12 स‌ाल में होने वाली यह यात्रा स‌ंभावित रूप स‌े २०१२ में होनी है। इस धार्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव भी एक कुंड ही है। ४०६१ मीटर की ऊंचाई पर ‌स्थित होमकुंड में पहुंचने के लिए ५१ किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है।
प्रकृति की गोद में ‌स्थित हेमकुंड स‌ाहिब में प्रत्येक वर्ष लाखों की स‌ंख्या में स‌िख श्रद्धालु आते हैं, लेकिन स‌ामान्य पर्यटकों की स‌ंख्या यहां नाममात्र ही है। बदरीनाथ यात्रा मार्ग ‌स्थित गोविंदघाट स‌े १९ किलोमीटर पैदल की दूरी पर है हेमकुंड। माना जाता है कि स‌िखों के दसवें गुरू गोविंद स‌िंह ने यहां तप किया था। एक मई को खुलने वाले कपाट के दौरान कई बार हेमकुंड बर्फ का मैदान बना हुआ दिखता है। स‌र्दियों में यहां की ‌स्थिति का अंदाजा आसानी स‌े लगाया जा स‌कता है।
इसी तरह एक स‌ाल में चारधाम आने वाले यात्रियों की स‌ंख्या बेशक लाखों में रहती है लेकिन बहुत कम पर्यटक ही इनके आसपास स्थित तालों को देखने का आनंद उठा पाते हैं। केदारनाथ स‌े आठ किलोमीटर की दर ४१३५ मीटर की ऊंचाई पर है बासुकी ताल। ऊंची चोटियों स‌े घिरे इस ताल स‌े चौखंबा चोटी का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। बदरीनाथ स‌े २५ किलोमीटर की दूरी पर ४४०२ मीटर की ऊंचाई पर है स‌तोपंथ झील। हिंदू धर्मशास्त्रों के मुताबिक इस तिकोनी झील के तीनों कोनों पर ब्रह्मा, विष्णु व महेश का वास है। यमुनोत्री स‌े आठ किलोमीटर दूर स‌प्तऋषि कुंड हो या फिर गंगोत्री स‌े १८ किलोमीटर दूर स्थित केदारताल। दोनों ही बेहद आकर्षक है।
यदि आप प्रकृति को और अधिक करीब स‌े देखना चाहते हैं तो उत्तराखंड में इस तरह के कई ताल आपके लिए बाहें फैलाए खड़े हैं। डोडीताल, स‌हस्त्रताल, मासरताल, काकभुसंडी ताल, स‌रूताल, गांधी स‌रोवर, देवरिया ताल, बांधनी ताल जाने के लिए आप टै्किंग का आनंद तो लेंगे ही, स‌मय की कमी होने पर मोटर मार्ग स‌े श्यामलाताल, नौकुचियाताल, टिहरी झील, आसन बैराज, नौकुचियाताल, स‌ातताल आदि का भी लुत्फ उठाया जा स‌कता है। और हां, विश्वप्रसिद्ध नैनीताल तो है ही।
हमारे पूर्वजों ने प्रकृति का जो बेहतर ढंग स‌े स‌ंरक्षण किया, तभी हम आज इन खूबसूरत स्थानों को देख पा रहे हैं। यात्रा के दौरान स‌िर्फ इसका ध्यान रखें कि ये स्थान आने वाली पीढ़ी के लिए भी इसी तरह स‌े स‌ुरक्षित रहें। यहां फैले प्लास्टिक या अन्य गंदगी को यदि ले जा स‌कें तो क्या कहने।

Thursday, January 1, 2009

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

दूर पहाड़ के कोने स‌े झांकती हुई नए स‌ाल की पहली किरण कुछ खास है। वो पहले की तरह हमें स‌ब कुछ देने को तैयार है, लेकिन इस बार हमस‌े भी कुछ मांग रही है। स‌ुबह मैंने उसके स‌ंकेतों को पढ़ने की कोशिश की। न एक स‌ेकंड पहले और न एक स‌ेकंड बाद। पूर्व निर्धारित स‌मय पर आकर उस किरण ने बताया कि स‌मय स‌बसे खास है। जिसने स‌मय को भुला दिया, स‌मय ने बहुत जल्द उसे भी भुला दिया। प्रकृति की स‌मयबद्धता ही उसे इतने स‌मय तक चिरयुवा रखे हुए है। स‌ुबह कभी थकी हुई नहीं लगती। बेशक यह रोज का क्रम हो लेकिन इसमें हमेशा नई ताजगी, नया जोश, नई उम्मीदें, नया उत्साह स‌ाफ दिखाई देता है। वो हमसे भी यही चाहती है।
आसमान में बादलों के बीच स‌े होती हुई स‌ुबह की पहली किरण कोशिश करती है कि वो किसी तरह धरती तक पहुंचे और उन तमाम लोगों के मन की इच्छा को पूरी करे जो इंतजार में है। घने बादलों के स‌मूह स‌े भी वह डरती नहीं। वह लगातार प्रयास करती है और यह स‌भी ने देखा है, किरण कभी वापस नहीं लौटती। चुनौती ‌स्वीकार करने का जोश भरती है स‌ुबह की किरण।
वह जानती है कि कुछ स‌मय बाद मेरे स्वरूप में बदलाव आ जाएगा। नर्म धूप की बजाए मैं कड़ी धूप में बदल जाऊंगी। लोग मुझस‌े छिपने लगेंगे। लेकिन वह इस बदलाव के डर स‌े भागती नहीं है, घबराती नहीं है। वह अपने कर्तव्यों स‌े पीछे नहीं हटती। लोगों को स‌ुबह की धूप का भरपूर आनंद देती है। वह फिर आने का वायदा करती है और आती भी है। परिवर्तनों की सहज स्वीकार करने का स‌ंदेश देती है स‌ुबह की पहली किरण।
स‌बसे महत्वपूर्ण बात। यह स‌भी की जिंदगी में उजाला करती है। अंधियारे को दूर करती है। वह नहीं देखती कि इससे कौन फायदा उठाएगा। वह अमीर-गरीब का भेद नहीं करती। वो छोटे-बड़े को अपनी रोशनी स‌े अलग-अलग नहीं करती। वो स‌मान रूप स‌े अपनी आभा बिखेरती है और स‌भी उसका लाभ उठाते हैं। नए स‌ाल की पहली किरण हमसे भी भेदभाव को दूर करने की मांग कर रही है।
आप स‌भी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। लोग बर्फ का इंतजार कर रहे हैं। उम्मीद है प्रकृति उन्हें निराश नहीं करेगी। अपना एक अलग रूप लोगों को दिखाएगी। हर मौसम में प्रकृति नए रूप में लोगों के स‌ामने आती है। यही उसकी खासियत भी है। प्रकृति स‌े हर मौसम में रूबरू होना एक अलग ही आनंद देता है। तो फिर इंतजार किसका है। पहाड़ में आपका स्वागत है। नए अनुभव लीजिए और पहाड़वाला के स‌ाथ बांटिए।

Sunday, November 16, 2008

पहाड़




पहाड़
आदमी स‌े पहले
पेड़ का घर है
पहाड़ों पर हवाएं पसरती हैं
पहाड़ों पर रहती हैं नदियां
कूदती-फांदती हुई
पहाड़
बर्फ, कोहरे और
बादलों के लिए होता है
बर्फ, बादल, कोहरा, पेड़, पानी
और हवाएं
होते हैं हमारे लिए
तुम्हारे लिए
चिड़ियों और मछलियों के लिए
कुछ इस तरह
स‌ारी दुनिया के लिए होते हैं
पहाड़।
(साभारः रचना- श्री लोकेश नवानी, फोटो- श्री डीएस स‌िजवाली)

Sunday, November 2, 2008

पहाड़वाला में आपका स्वागत है...

पहाड़वाला एक मंच है, पहाड़ से सम्बंधित उन तमाम विषयों पर चर्चा करने का, जो भागती जिंदगी में कहीं छूट से गए हैं। यहाँ न सिर्फ़ पहाड़ की खूबसूरती और विशेषताओं की बातें होंगी, बल्कि उसकी विषमता और विवशता को भी सामने रखा जाएगा। तो उठाइए अपने मुद्दे, रखिये अपनी बात। दूसरे के विचारों को दें मजबूती या खारिज करिए आधारहीन तथ्यों को। इंतजार नहीं, आज से ही करें शुरुआत.....